कौन सुनेगा इनकी व्यथा


रमेश पाण्डेय
शिक्षा समाज का दर्पण है और शिक्षक उस दर्पण का निर्माता और नियंत्रणकर्ता है। अगर किसी समाज की स्थिति का आंकलन करना है तो उस समाज की शिक्षा व्यवस्था के पैमाने को देखकर आंकी जा सकती है। आज नहीं वैदिक काल में शिक्षा और शिक्षक का महत्वपूर्ण दर्जा होता रहा। इन सब के बावजूद उत्तर प्रदेश में शिक्षा के रीढ बने वित्तविहीन विद्यालयों की दशा को सुधारने और उसमें कार्य कर रहे शिक्षण-शिक्षणेत्तर कर्मचारियों की व्यथा को कोई सुनने वाला नहीं है। बेशक राज्य और केन्द्र की सरकार आये दिन अपनी शाबाशी का ढिढोरा पीट रही है। पर वह अपनी शाबाशी का बखान कैसे कर रही है और उसका समाज पर क्या प्रभाव पड रहा है, कभी इसका मूल्यांकन करने की जरूरत नहीं समझती है। कुछ चुनिंदा चाटुकारों द्वारा की गयी तारीफ को ही सबकी आवाज मान ली जाती है। हम आपका ध्यान उत्तर प्रदेश में नयी पीढी को शिक्षा प्रदान करने वाले वित्तविहीन विद्यालयों में कार्य कर रहे शिक्षण-शिक्षणेत्तरकर्मियों की ओर दिलाना चाहते हैं। वर्तमान में उत्तर प्रदेश में कुल 14735 हाईस्कूल और इंटरमीडिएट स्तर के वित्तविहीन विद्यालय संचालित है। यह उन विद्यालयों का आंकडा है, जिसे शासन ने धारा 7-क के अन्तर्गत मान्यता प्रदान की है। मानक के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में इन विद्यालयों का संचालन करने के लिए 32 विस्वा और शहरी क्षेत्र में संचालन करने के लिए 8 विस्वा भूमि की जरूरत पडती है।  इसके अलावा विद्यालय में पुस्तकालय, प्रयोगशाला के साथ-साथ खेल का मैदान होना आवश्यक है। हाईस्कूल स्तर तक के लिए 12 और इंटरमीडिएट स्तर के लिए 18 पक्के कमरे का होना आवश्यक है। इन विद्यालयों में शिक्षक और स्टाफ रखने का मानक इस प्रकार है। हाईस्कूल के स्तर पर एक प्रधानाचार्य, छह शिक्षक, एक लिपिक और तीन अनुचर और इंटरमीडिएट के स्तर पर एक प्रधानाचार्य, छह सहायक अध्यापक, दस लेक्चरर, तीन लिपिक और पांच अनुचर रखे जाने का प्रावधान है। इस तरह से प्रदेश में संचालित हो रहे वित्तविहीन विद्यालयों में कुल एक लाख 80 हजार हजार शिक्षण-शिक्षणेत्तर कर्मचारी काम कर रहे है। दुखद है कि इन कर्मचारियों को विद्यालय प्रबंध तंत्र द्वारा कहीं पर पांच सौ रूपये तो कहीं पर 1500 रूपये मानदेय के तौर पर दिया जाता है। इस मंहगाई के दौर में इतनी कम आय में परिवार की आजीविका चलानी मुश्किल है। दूसरी तरफ देखा जाये तो केन्द्र सरकार द्वारा देश में शिक्षा अधिकार अधिनियम यानि राईट टू एजूकेशन एक्ट लागू किया है। इस एक्ट के मुताबिक देश के प्रत्येक बच्चे को शिक्षित बनाना है। इसके लिए प्रदेश मे वित्तविहीन विद्यालय ही शिक्षा व्यवस्था की रीढ हैं। आंकडों पर गौर करें तो दस फीसदी राजकीय और 20 फीसदी ही वित्तीय सहायता प्राप्त विद्यालय है। इसके अलावा 70 फीसदी स्कूल वित्तविहीन विद्यालय ही हैं। गौरतलब है कि इन वित्तविहीन विद्यालयों द्वारा शिक्षा प्रदान किये जाने का प्रदर्शन भी बेहतर रहा है। पिछले दो वर्ष से हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षा में सर्वोच्च अंक पाने के साथ ही टापटेन की सूची में शामिल बच्चों के बारे में जानकारी ली जाये तो उनमें से सर्वाधिक बच्चे इन्ही वित्तविहीन विद्यालयों के छात्र हैं। इन वित्तविहीन विद्यालयों के कर्मचारियों ने शासन से पूर्णकालिक शिक्षक और कर्मचारी का दर्जा प्रदान किये जाने के साथ ही विद्यालयों को सवित्त किये जाने और वेतन दिये जाने की मांग उठाई तो वर्ष 2012 में उत्तर प्रदेश विधान सभा के आम चुनाव में उतरी समाजवादी पार्टी ने अपने घोषणा पत्र के बिन्दु-3 में इस बात का उल्लेख किया कि अगर समाजवादी पार्टी सत्ता में आती है तो इन वित्तविहीन विद्यालयों के शिक्षण-शिक्षणेत्तर कर्मचारियों को जीविकोपार्जन मानदेय प्रदान किया जाएगा। संयोग अच्छा रहा कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को बहुमत मिला और सरकार बन गयी। सरकार बनने के बाद घोषणापत्र में किये गये वायदे के अनुसार मई 2012 में शासन द्वारा प्रदेश के सभी जिलों में संचालित वित्तविहीन विद्यालय में काम कर रहे शिक्षण-शिक्षणेत्तर कर्मचारियों की सूची जिला विद्यालय निरीक्षक के माध्यम से मांगी। इसके बाद संबंधित आंकडों की सीडी और हार्ड कापी शासन को उपलब्ध कराई गई। किन्तु इसके बात आगे की कोई कार्यवाही नहीं हुई। शासन द्वारा खामोशी अख्तियार किये जाने के बाद अपने हक की मांग को लेकर इन शिक्षण-शिक्षणेत्तर कर्मचारियों ने अक्टूबर 2012 में धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया। विधानसभा के सामने हुए प्रदर्शन में कभी पूर्व मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी पहुंचे तो कभी समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी आये।इन लोगों ने वही पुराना आश्वासन दिया और जल्द कार्यवाही पूर्ण किये जाने की बात कही। इसके बाद भी कोई बात आगे नहीं बढी तो वित्तविहीन विद्यालय के शिक्षकों ने बोर्ड की परीक्षा के बाद उत्तरपुस्तिका के मूल्यांकन का बहिष्कार किये जाने का ऐलान कर दिया और आन्दोलन शुरू कर दिया। स्थिति बेकाबू होता देख मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पहल पर माध्यमिक शिक्षा राज्यमंत्री विजय बहादुर पाल और पंडित सिंह के साथ माध्यमिक शिक्षा निदेशक वासुदेव यादव ने पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल को बुलाकर वार्ता की। इस प्रतिनिधिमंडल में उमेश द्विवेदी, लाल बिहारी यादव, रामवीर यादव, रामपाल सिंह जंगरा और राधेश्याम तिवारी शामिल रहे। वार्ता में इस बात पर सहमति बनी कि जुलाई 2013 तक इन शिक्षकों को पूर्णकालिक कर्मचारी का दर्जा प्रदान करते हुए मानदेय प्रदान किये जाने की घोषणा कर दी जाएगी। इसके बाद वित्तविहीन विद्यालय के शिक्षकों द्वारा किय गय उत्तर पुस्तिका के मूल्यांकन कार्य का बहिष्कार वापस ले लिया गया, किन्तु फिर जुलाई 2013 में कोई कार्यवाही नहीं हुई। इसके बाद शिक्षकों और कर्मचारियों ने 10 अक्टूबर को राजधानी में आन्दोलन किये जाने की चेतावनी दी गयी तो 28 सितंबर को फिर माध्यमिक शिक्षा निदेशक वासुदेव यादव ने शिक्षकों के प्रतिनिधिमंडल को बुलाकर आश्वस्त किया कि दस दिन के भीतर सभी औपचारिकता पूरी कर दी जाएगी। तब से अक्टूबर 2013 बीतने वाला है और अभी तक कोई कार्यवाही नहीं की गयी। उधर उच्च न्यायालय इलाहाबाद के आदेश के अनुसार अबकी बार वित्तविहीन विद्यालय के शिक्षक भी होने वाले आगामी शिक्षक विधायक के चुनाव में मताधिकार का प्रयोग करने के लिए अर्ह होंगे। मौजूदा समय में मतदाता सूची तैयार हो रही है। अब इन शिक्षकों की व्यथा को कोई सुनने वाला नहीं है। शिक्षकों ने अगर सही ढंग से एकजुटता दिखाकर शिक्षक और स्नातक निर्वाचन में अपनी ताकत का एहसास करा दिया तो कई राजनैतिक दल उनके पीछे लग जाएंगे, पर अभी कोई भी उनका उत्साहवर्धन करने वाला नहीं है।

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