Monday, 10 October 2016

दशहरा यानी शक्ति का समन्वय समझाने वाला उत्सव

दशहरे का उत्सव यानी शक्ति और शक्ति का समन्वय समझाने वाला उत्सव। नवरात्रि के नौ दिन जगतजननी मां जगदम्बा की उपासना करके शक्तिशाली बना हुआ साधक विजय प्राप्ति के लिए नाच उठे।यह बिल्कुल स्वाभाविक है इस दृष्टि से देखने पर दशहरे  का उत्सव अर्थात विजय के लिए प्रस्थान का उत्सव।हमारी भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक है,शौर्य की उपासक है,व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव रखा गया।एक तरफ जहां नवरात्र के समापन पर पुरे देशभर में भक्त मां जगत जननी जगदम्बा के प्रतिमाओं का विसर्जन करते हैं तो वहीं दूसरी तरफ दशहरे का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाते हैं।कहते हैं प्राचीन काल में राजा-महाराजा इस दिन विजय की प्रार्थना कर रण-यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे।कलष- पूजा- हवन- मिटटी- मंत्र- मूर्ति- अर्चना- अराधना- साधना- त्याग- तपस्या और उपवास की पावन परंपरा का नाम है नवरात्र। और इसी नवरात्री की पूर्णाहुति का दिन है विजयादशमी।शौर्य का यह पावन पर्व विजयादशमी,नौ दिनों की नवरात्र के उमंग के इस दिन को दशहरा भी कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि आश्विन शुक्लदशमी को तारा उदय होने के समय ‘विजय’ नामक मुहूर्त होता है।यह काल सर्वकार्य सिद्धिदायक माना जाता है।सनातन धर्म के वैदिक ग्रंथों में कहा गया है कि जीव और जीवन का आश्रय, इस धरा को बचाए रखने के लिए युगों युगों से देव और दानवों में ठनी रहीं। देवता जो कि कल्याणकारी, धर्म- मर्यादा और भक्तों के रक्षक हैं तो वहीं दानव इसके विपरित इसी क्रम में जब रक्तबीज, महिशासुर जैसे अत्याचारियों ने जीवन का आश्रय इस पावन धरा और फिर इसके रक्षक देवताओं को पीड़ित करने लगे।तो देवगणों ने एक अद्भुत “शक्ति का सृजन कर उन्हें अपने अस्त्र-शस्त्र प्रदान किये।सभी अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित माता का स्वरूप अद्भुत था।एक अद्भुत तेज,एक अद्भुत चमक,दस भुजाएं,त्रिनैना,सिंह पर सवार।जिनका जन्म हुआ था समस्त ब्रह्माण्ड की रक्षा के लिए।भक्तों की रक्षा और देव कल्याण के लिए भगवती दुर्गा ने नौ दिनों में नौ रूपों अर्थात् जयंती, मंगला, काली, भद्रकाली कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा, स्वधा को प्रकट किया। जो नौ दिनों तक महाभयानक युद्ध कर शुम्भ-निशुंभ, रक्तबीज और महिशासुर जैसे अनेकों दैत्यों का संहार कर भू और देवलोक में नवचेतना, कल्याण, ओज,तेज,साहस,प्राण और रक्षा शक्ति का संचार कर दिया।सदियों से आश्विन मास के “शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला यह त्यौहार संकेतात्मक तौर पर कर्इ परंपराओं को अपने साथ जीवंत बनाए रखा है। दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों....काम, क्रोध,लोभ,मोह,मद,मत्सर,अहंकार,आलस्य,हिंसा और चोरी के परित्याग की हमें सद्प्रेरणा प्रदान करता है। दशहरा यानी विजयादशमी भगवान राम की विजय दिवस और दुर्गापूजा दोनों ही रूपों में “शक्ति पूजा का यह पावन पर्व है।तमाम “शास्त्रों को धारण किये माँ की इन मूर्तियों से हमारी संस्कृति में “शास्त्रों की पूजा को प्रधानता मिली और “शायद यही कारण है कि इस दिन “शस्त्रों की पूजा करना “शुभ माना गया है। यह एक ऐसी पावन तिथि है ... जिसका हमारे जीवन में बहुत महत्व है। यही वो दिन है जब श्री रामचन्द्रजी महाराज ने “शारदीय नवरात्रि पूजा का प्रारंभ समुद्र तट पर किया और उसके बाद दसवें दिन लंका पर विजय प्राप्त की। तभी से ये दिन बन गया असत्य पर सत्य, अधर्म पर धर्म की जीत का दिन। इस दिन भगवान् राम ने दुष्ट रावण का अंत कर अपनी भार्या जगत जननी माता सीता को मुक्त कराया और पृथ्वीवासीयों, देवताओं को राक्षसों के अत्याचार से भयहीन किया। आश्विन “शुक्ल पक्ष की दसवीं तिथि को विजयदशमी का त्यौहार पूरे देश में बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है।देश के हर हिस्से में, हर जगह, अलग-अलग भाषाओं में राम, लक्ष्मण, सीता और हनुमान के जीवनी पर आधारित नाट्य कार्यक्रम किये जाते हैं।कलाकार राम, लक्ष्मण और रावण का स्वरूप बनाकर रामलीलाओं में जगह-जगह रावण वध का प्रदर्शन करते है।खुले मैदानों में रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले तैयार कर खड़े किये जाते हैं। ये पुतले रंगीन कागज, लकड़ी, बांस और भूसे से बनाये जाते हैं और इन पुतलों के भीतर पटाखे भर दिये जाते हैं और दशमी के संध्या को बड़ी धूम-धाम से ढ़ोल नगाड़ो के साथ पुतलों पर आग वाले तीर चलाये जाते हैं। बड़ी संख्या में लोग एकत्रित हो कर इस रोमांचकारी दृश्य का आनंद लेते हैं। दुर्गा दशमी या विजयदशमी मां के पूजन का दसवां दिन होता है।इस दिन देवी अपराजिता की पूजा की जाती है और देवी दुर्गा की प्रतिमा को नदी, तालाब या सरोवरों में विसर्जित किया जाता है। तो वहीं दूसरी ओर विजय दशमी के रूप में भगवान् राम की विजय की ख़ुशी में रावण के पूतले का दहन किया जाता है....
 हमारा देश आस्थाओं का देश है।यहां हर एक त्योहार को बड़े ही श्रद्धा भाव के साथ मनाया जाता है। दशहरा यानी कि विजयादशमी राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा के रूप में दोनों ही रूपों में यह “शक्ति पूजा का पर्व है।शस्त्र पूजन की तिथि है,यह पर्व है हर्ष का,उल्लास का,अधर्म पर धर्म के विजय का।देश के कोने-कोने में यह उत्सव विभिन्न रूपों से मनाया तो जाता ही है।साथ ही साथ दूसरे देशों में भी जहाँ भारतीय प्रवासी रहते हैं।इसे उतने ही जोश और उल्लास के साथ मनाया जाता है। अपनी संस्कृति और विरासत के लिए मशहूर बंगाल में दशहरा का अर्थ है-दुर्गा पूजा जो चार दिनों तक मनाया जाने वाला यह उत्सव यहां के लागों के लिए खासा महत्व रखता है।ये चार दिन सप्तमी,अष्टमी, नवमीं और दशमी के नाम से जाने जाते हैं।दसवां दिन अर्थात् मां दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन का दिन।इस दिन यहां माता की प्रतिमाओं की भव्य झांकियां निकाली जाती है।विवाहित महिलाएं मां को सिंदूर लगाने के साथ-साथ अन्य महिलाओं को भी सिंदूर लगाती हैं।जिसे यहां ‘सिंदूर खेला’ कहा जाता है साथ ही  बड़े धूम-धाम से ढ़ाक के साथ लोग नाचते गाते हैं और ये पावन उत्सव मनाते है। उड़ीसा और असम में भी चार दिनों तक मां दूर्गा की पूजा की जाती है।यहां लोग देवी दुर्गा को सुशोभित पंडालों में विराजमान करते हैं। यहां की सभी परम्पराएं लगभग बंगाल से मिलती जुलती ही होती हैं। गुजरात में मिट्टी सुशोभित रंगीन घड़े को देवी की प्रतीक मान कर अविवाहित लड़कियां उसे सिर पर रखकर एक लोकप्रिय नृत्य करती हैं। जिसे गरबा कहा जाता है। यह नृत्य यहां की “शान है। पुरुष और स्त्रियां दो छोटे रंगीन डंडों को संगीत की लय पर आपस में बजाते हुए घूम-घूम कर नृत्य करते हैं। जिसे डांडिया भी कहा जाता है। गुजरात में एक ओर जहां गरबा की धूम रहती है।तो वहीं दूसरी ओर तामिलनाडु, आंध्रप्रदेश और कर्नाटक में दशहरा नौ दिनों तक चलता है।जिसमें तीन देवियां लक्ष्मी,सरस्वती और दुर्गा की पूजा की जाती है।प्रथम तीन दिनों तक सुख-समृद्धि प्रदायिणी माता लक्ष्मी की,उसके बाद के तीन दिनों तक विद्यादायिणी मां सरस्वती की और अंतिम तीन दिनों तक “शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा की पूजा की जाती है।
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में भी अन्य स्थानों की भांति ही लगभग एक सप्ताह पूर्व ही इस पर्व की तैयारी शुरू हो जाती है।यहां इस उत्सव का प्रारम्भ श्री रधुनाथ जी की वंदना से ही होती है।यहां के लोग सामूहिक रूप से नगर के मुख्य स्थानों से होते हुए नगर की परिक्रमा करते हैं। पंजाब में दशहरे के दिन मेहमानों का स्वागत मिठार्इ और उपहारों से किया जाता है। जगह-जगह रावण के पूतले जलाए जाते हैं,साथ ही कर्इ स्थानों पर मेले का आयोजन भी किया जाता है। महाराष्ट्र में नवरात्र के नव दिन समर्पित है माँ दुर्गा को।जबकि दसवें दिन वंदना की जाती है मां सरस्वती की। किसी भी शुभ कार्य के शुरूआत के लिए इस दिन को यहां अति शुभ माना जाता है। लोग इस दिन यहां विवाह, गृह-प्रवेश और नये घर खरीदने के लिए अत्यन्त शुभ मानते है। कश्मीर के अल्पसंख्यक हिन्दू नवरात्रि के पर्व को बड़े श्रद्धा से मनाते हैं।लोग यहां नौ दिनों तक माता खीर भवानी के दर्शन को जाते हैं।ऐसा माना जाता है कि यदि कोर्इ अनहोनी होने वाली होती हैं तो सरोवर का पानी काला हो जाता है। दोस्तों दशहरे का सांस्कृतिक पहलू भी है।यह एक पर्व एक ही दिन अलग-अलग जगह भिन्न-भिन्न रुपों में मनाया जाता है।लेकिन फिर भी एकता देखने योग्य होती है। आश्विन शुक्ल दशमी को विजयादशमी कहा जाता है ।विजय के संदर्भ में इस दिन को दशहरा, विजयादशमी इत्यादि नामों से जाना जाता है जो कि साडे तीन मुहूर्तों में से एक है।दुर्गा नवरात्रि की समाप्ति पर यह दिन आता है। इसलिए इसे `नवरात्रिका समाप्ति-दिन' भी मानते हैं। मित्रो एक मनुष्य जब अपनी पूरी गरिमा के साथ, पूरी मर्यादा के साथ, अपने पूरे स्वभाव के साथ उपस्थित होता है तो वह राम है। राम हमारी सभ्यता संस्कृति के एक ऐसे आदर्श है, जिसने प्रेम, सत्यता और कर्तव्य के अनोखे प्रतिमान स्थापित किए। जिसके सामने आज सदियों बाद भी सम्पूर्ण भारतीय जनमानस नतमस्तक है।प्रभू श्री राम आप की सभी मनोंकामनाओं को पुरा करें।हमारी तो यही कामना है कि शक्ति की उपासना का ये पावन पर्व नवरात्र और विजयादशमी आपके जीवन में हर प्रकार की सफलता लेकर आए।आप नितनई उंचाईयों का वरण करे।साथ ही समाज के प्रति अपने दायित्वों का निर्वाह करें।

Thursday, 1 September 2016

पंडवानी की मेरी तान गूंजती रहेगी

बहुत कम लोग इस बात से वाकिफ हैं कि देश और दुनिया में प्रसिद्ध पंडवानी गायिका तीजन बाई भिलाई इस्पात संयत्र में सेवारत रहीं। पद्म श्री एवं पद्म भूषण डॉ. तीजन बाई भिलाई इस्पात संयंत्र की सेवा से 31 अगस्त, 2016 को सेवानिवृत्त हो गई। भिलाई निवास के बहुउद्देशीय सभागार में आयोजित विदाई समारोह में भिलाई इस्पात संयंत्र के मुख्य कार्यपालक अधिकारी एम रवि ने स्वयं जाकर डॉ. श्रीमती तीजन बाई को सम्मानित करते हुए गरिमामय विदाई दी। एक संस्मरण की चर्चा करते हुए डॉ. श्रीमती तीजन बाई ने कहा कि मैं बीएसपी और भिलाई को कभी छोड़ नहीं सकती हूँ। आज मैं रिटायर्ड जरूर हो रही हूँ किन्तु पंडवानी की मेरी तान भिलाई, छत्तीसगढ़ और देश विदेश में गंूजती रहेगी। पद्म श्री एवं पद्म भूषण जैसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित छत्तीसगढ़ और देश की एकमात्र महिला कलाकार डॉ. श्रीमती तीजन बाई का जन्म 8 अगस्त, 1956 में ग्राम अटारी (पाटन), जिला दुर्ग, छत्तीसगढ़ में हुआ था। बचपन में अपने नाना बृजलाल पारधी से पंडवानी की गाथा को सुनने का अवसर मिला। उनके नाना ने ही पहली बार तीजन बाई जी के अंदर पंडवानी के प्रति आसक्ति और एक कलाकार को पहचाना। उसके बाद उमैद सिंह देशमुख से श्रीमती तीजन बाई ने औपचारिक रुप से पंडवानी गायन का प्रशिक्षण प्राप्त किया। 13 वर्ष की उम्र में ग्राम चंद्रखुरी में श्रीमती तीजन आई ने पहली बार कार्यक्रम प्रस्तुत किया। भिलाई इस्पात संयंत्र ने 1975-76 में छत्तीसगढ़ की विभिन्न सांस्कृतिक परम्पराओं और कला के संवर्धन और संरक्षण के उद्देश्य से छत्तीसगढ़ लोक कला महोत्सव की शुरूआत की। इस मंच पर तीजन बाई जी ने अपना कार्यक्रम प्रस्तुत किया और भिलाई इस्पात संयंत्र से जुड़ गई। संयंत्र के मंच ने पंडवानी गायन के क्षेत्र में उन्हें भरपूर अवसर दिया और उन्होने प्रसिद्धि हासिल की। 1985-86 में फ्रांस के पेरिस में आयोजित भारत महोत्सव में देश और छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व करते हुए श्रीमती तीजन बाई ने कापालिक शैली में अपनी अनूठी पंडवानी प्रस्तुत की और पूरे भारत महोत्सव में आकर्षण का केन्द्र बिन्दु रही। जुलाई 1986 में श्रीमती तीजन बाई को भिलाई इस्पात संयंत्र ने प्रदेश और देश का सांस्कृतिक दूत मानते हुए अपने सांस्कृतिक विभाग में कार्यसेवा के लिये नियुक्ति प्रदान की। लगभग 30 वर्ष तक भिलाई इस्पात संयंत्र की सेवा करने के बाद वे 31 अगस्त, 2016 को सेवानिवृत्त हो गई है। फ्रांस, जर्मनी, लंदन सहित दो दर्जन से अधिक देशों में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुकी श्रीमती तीजन बाई को 1988 में भारत शासन ने पद्म श्री से सम्मानित किया। अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित तीजन बाई जी को 2003 में भारत शासन ने पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित किया। यह सम्मान महामहिम राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने 3 अप्रैल, 2003 को प्रदान किया। रायपुर, बिलासपुर और जबलपुर विश्वविद्यालय ने 3 डी लिट से सम्मानित किया। 1996 में संगीत नाटक अकादमी सम्मान, 1998 में देवी अहिल्या बाई सम्मान, 1999 में इसुरी सम्मान से लेकर 2016 में एम एस सुब्बुलक्ष्मी राष्ट्रीय पुरस्कार तक प्राप्त करने वाली डॉ. श्रीमती तीजन बाई को पूरे देश में अनेक स्थानों पर सम्मानित किया है। दुनिया की चर्चित कथा महाभारत को पूरे वेग और सम्प्रेषणिता के माध्यम से कापालिक शैली में मंच पर प्रस्तुत करने वाली डॉ. श्रीमती तीजन बाई आज छत्तीसगढ़ और भिलाई इस्पात संयंत्र की सांस्कृतिक राजदूत के रूप में पहचानी जाती है। सेवानिवृत्ति पर आयोजित सम्मान समारोह में डॉ. श्रीमती तीजन बाई को स्मृति चिन्ह के साथ-साथ उनके 30 वर्ष के जीवन यात्रा के सुखद क्षणों की स्मृतियों को संजो कर रखने वाले छायाचित्रों का एक एलबम जनसंपर्क विभाग द्वारा प्रदान किया गया।

सफलता में जो साथ दे वो महान : तीजन
आज मैं जिस मुकाम पर पहुंची हूँ वह सिर्फ भिलाई इस्पात संयंत्र के कारण। ग्राम हल्दी से मुझे बुला कर मडई में पंडवानी गाने के लिये लाया गया था। तब मैं बहुत कम उम्र की थी। बाद में मुझे बीएसपी ने नौकरी दी किन्तु मुझे बांध कर नही रखा। मुझे पूरी स्वतंत्रता और आजादी मिली अपनी कला के लिये। बीएसपी ने नौकरी तो दे दी किन्तु मुझे मेहनत करनी पड़ी। आपकी सफलता में जो साथ देता है वो महान होता है। भिलाई इस्पात संयंत्र और उसके लोग मेरे लिये महान है। उनके योगदान को मैं कभी भूला नहीं पाउंगी। यह विचार 31 अगस्त, 2016 को सेवानिवृत्त होने के बाद डॉ. श्रीमती तीजन बाई ने अपने निवास में व्यक्त किये। उन्होंने बताया कि मैं ग्राम गनियारी की रहने वाली हूँ और मैं 13 वर्ष की उम्र से पंडवानी गाने लगी थी। मुझे ग्राम हल्दी में भिलाई की मडई में आने और पंडवानी प्रस्तुत करने कहा गया। वह दिन था और मैं भिलाई से जुड़ गई। मैंने पीछे मुड़कर नही देखा। जीवन में बहुत से उतार चढ़ाव आये किन्तु मेरी मेहनत ने मुझे हमेशा आगे ही बढ़ाया। अपने बचपन और पंडवानी गायन से जुड़ने की रोचक कहानी अपनी चिरपरिचित शैली में बताते हुए कहा कि हम लोग पारधी (शिकारी) परिवार से थे। हमारा घर मेरे नाना  बृजलाल पारधी के घर के नजदीक ही था। सबसे पहले मैंने उनके मुख से ही महाभारत की कथा को सुना। मैं उनसे बहुत डरती थी, किन्तु इसके बावजूद मैं पंडवानी से जुड़ी। मेरे नाना जी ने ही पहली बार मेरे अंदर की कला को समझा और कहा कि मेरे घर में ही एक कलाकार छुपा है और मुझे पता ही नहीं चला। फिर उन्होंने ही पंडवानी एवं महाभारत की कथा से पूरा परिचय करवाया। बाद में मैं श्री उमैद सिंह देशमुख से पंडवानी की शिक्षा ली।

मेहनत का कोई तोड़ नहीं
पूरे देश में 212 बच्चों को अब तक पंडवानी गायन सिखा चुकी डॉ. तीजन बाई ने कहा कि आने वाली पीढी को बहुत मेहनत करने की आवश्यकता है। मेरी यह कला और पनपे यही मेरी इच्छा और आशीर्वाद है। उन्होंने कहा कि मेहनत का कोई तोड़ नहीं है। आप जितनी मेहनत करेंगे उतना ही आगे बढ़ेंगे। लगन और मेहनत ही सफलता की कुंजी है। कला में तो खास कर लगन, प्रेम और मेहनत तीनों का योगदान जरूरी है।

Friday, 3 June 2016

मथुरा में हुई 24 मौतों का जिम्मेदार कौन ?

उत्तर प्रदेश के मथुरा के जवाहर बाग की बागवानी विभाग की करीब 100 एकड़ जमीन पर अवैध कब्जे को हटाने पहुंची पुलिस और कब्जेधारियों के लिए बीच हुए भीषण संघर्ष में 24 लोगों की मौत हो गई जिसमें एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी और थाना प्रभारी संतोष कुमार की भी मौत हो गई। इस हिंसा में कुल 22 अतिक्रमणकारी मारे गए हैं। हिंसक झड़प के दौरान कुछ पुलिसकर्मी भी घायल हुए है। 22 उपद्रवियों में कुछ महिलाएं भी शामिल है। 22 उपद्रवियों में से 11 की मौत जलकर हुई। शहीद पुलिसकर्मियों के परिवारों को 20-20 लाख का रुपए के मुआवजे का ऐलान किया गया है। इस घटना की न्यायिक जांच के आदेश दे दिए गए है। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने मथुरा हिंसा पर अखिलेश यादव से बातचीत की है और हरसंभव मदद का भरोसा दिया है। जवाहर बाग इलाके में हिंसा तब शुरू हुई जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश के पालन में पुलिस कर्मी, जवाहर बाग में अतिक्रमणकारियों को हटाने की कोशिश कर रहे थे। समझा जाता है कि पथराव आजाद भारत विधिक वैचारिक क्रांति सत्याग्रही संगठन के कार्यकर्ताओं ने किया जिन्होंने अतिक्रमण किया था। आईजी (कानून एवं व्यवस्था) एचआर शर्मा ने बताया कि करीब 3000 अतिक्रमणकारियों ने पुलिस दल के मौके पर पहुंचने पर उस पर पथराव किया और फिर गोली चलाई। उन्होंने बताया कि जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने पहले लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े और फिर गोली चलाई। अतिक्रमणकारियों की गोलीबारी में पुलिस अधीक्षक मुकुल द्विवेदी और फाराह पुलिस थाने के प्रभारी संतोष कुमार की जान चली गई। शहर के नियति अस्पताल के सीईओ एवं क्रिटिकल केयर विभाग के निदेशक डॉ. आरके मणि ने बताया कि द्विवेदी की अस्पताल में इलाज के दौरान मृत्यु हो गई। जवाहर बाग में कार्रवाई जारी है। हालांकि आजाद भारत विधिक वैचारिक क्रांति सत्याग्रही गुट के कार्यकर्ताओं को पुलिस, पीएसी और आरएएफ के संयुक्त अभियान द्वारा वहां से खदेड़ दिया गया। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने घटना पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए, मृत पुलिस कर्मियों के परिजनों को 20-20 लाख रुपए की आर्थिक सहायता का ऐलान किया है। मुख्यमंत्री ने घटनास्थल पर अतिरिक्त पुलिस बल तैनात करने और दोषियों को गिरफ्तार करने का निर्देश भी दिया है। डीएम राजेश कुमार ने बताया कि कार्यकर्ताओं के नेता राम वृक्ष यादव और समूह के सुरक्षा अधिकारी चंदन गौर वहां से अपने हजारों समर्थकों के साथ भाग गए। उन्होंने बताया कि अतिक्रमणकारी पिछले ढाई साल से सरकारी बाग पर कब्जा जमाए बैठे थे। उन्हें कई बार नोटिस देकर मौके से हट जाने को कहा गया था। पिछले दो माह से उनको बलपूर्वक हटाए जाने के प्रयास किए जा रहे थे।

Sunday, 8 May 2016

इक पलड़े में प्यार रख, दूजे में संसार...

मशहूर शायर निदा फाजली का एक दोहा याद आता है। ‘इक पलड़े में प्यार रख, दूजे में संसार,तोले से ही जानिए, किसमें कितना प्यार’। यह दोहा उस मां को समर्पित है शिशु के उत्थान में जिसकी भूमिका महान होती है। मई माह का दूसरा रविवार मातृ दिवस के रुप में मनाया जाता है। जन्मदात्री मां से लेकर पृथ्वी मां तक सभी आज संकट में हैं। आज का दिन अपनी धरती मां को राहत की सांस दिलाने का संकल्प लेने का दिन है। मां को खुशियाँ और सम्मान देने केलिए पूरी जिदगी भी कम होती है। फिर भी विश्व में मां के सम्मान में मातृ दिवस मनाया जाता है। मातृ दिवस विश्व के अलग-अलग भागों में अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है। परन्तु मई माह के दूसरे रविवार को सर्वाधिक महत्त्व दिया जाता है। हालांकि भारत के कुछ भागों में इसे 19 अगस्त को भी मनाया जाता है, परन्तु अधिक महत्ता अमरीकी आधार पर मनाए जाने वाले मातृ दिवस की है, अमेरिका में यह दिन इतना महत्त्वपूर्ण है कि यह एकदम से उत्सव की तरह मनाया जाता है। इस को आधिकारिक बनाने का निर्णय पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति वूडरो विलसन ने 8 मई , 1914 को लिया। मदर्स डे की शुरूआत अमेरिका से हुई। वहाँ एक कवयित्री और लेखिका जूलिया वार्ड होव ने 1870 में 10 मई को माँ के नाम समर्पित करते हुए कई रचनाएँ लिखीं। वे मानती थीं कि महिलाओं की सामाजिक जिÞम्मेदारी व्यापक होनी चाहिए। जरा सोचिए जब मैं पैदा हुआ, इस दुनिया में आया, वो एकमात्र ऐसा दिन था मेरे जीवन का जब मैं रो रहा था और मेरी मॉं के चेहरे पर एक सन्तोषजनक मुस्कान थी। ये शब्द हैं प्रख्यात वैज्ञानिक और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम के। एक माँ हमारी भावनाओं के साथ कितनी खूबी से जुड़ी होती है, ये समझाने के लिए उपरोक्त पंक्तियां अपने आप में सम्पूर्ण हैं। किसी औलाद के लिए ‘माँ’ शब्द का मतलब सिर्फ पुकारने या फिर संबोधित करने से ही नहीं होता बल्कि उसके लिए मां शब्द में ही सारी दुनिया बसती है, दूसरी ओर संतान की खुशी और उसका सुख ही माँ के लिए उसका संसार होता है। क्या कभी आपने सोचा है कि ठोकर लगने पर या मुसीबत की घड़ी में मां ही क्यों याद आती है क्योंकि वो मां ही होती है जो हमे तब से जानती है जब हम अजन्में होते हैं। मां के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए एक दिन नहीं बल्कि एक सदी भी कम है। हम इंसानों और धरती के बीच भी तो एक शिशु और मां का रिश्ता ही है। जिस तरह जन्मदात्री माता हमारा पालन-पोषण करती है, उसी तरह पृथ्वी भी प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से हमारा पालन-पोषण करती है। इसमें उत्पन्न अन्न, फल-फूल, मेवे हमारा आहार बनते हैं। इसमें बहने वाली नदियों के पानी से हमारी प्यास बुझती है। पृथ्वी के वायुमंडल में मौजूद आॅक्सीजन हमारे जीवित रहने के लिए अनिवार्य है। यह आॅक्सीजन पृथ्वी पर उगने वाले पेड़-पौधे ही देते हैं। इस धरती की धूल में लोट-लोटकर ही हम बड़े होते हैं। पृथ्वी की ऊपरी सतह यानी मिट्टी खुद उपचारक शक्ति से भरी है। लेकिन धरती मां से हमारा रिश्ता लगातार कमजोर पड़ता जा रहा है। इसमें अनेक दरारें पड़ चुकी हैं। इसका सीधा असर हमारे पोषण और परिवेश पर पड़ रहा है। जिस तरह एक मां के स्वास्थ्य का सीधा संबंध उसके बच्चे की सेहत से है, उसी प्रकार धरती मां के स्वास्थ्य का संबंध भी उसकी संतानों यानी हम इंसानों से है। यदि धरती मां का स्वास्थ्य पूरी तरह बिगड़ गया, तो हमारा न केवल भौतिक स्वास्थ्य बिगड़ जाएगा, बल्कि जीवित रहना ही असंभव हो जाएगा। धरती मां के स्वास्थ्य से तात्पर्य है उसकी ऊपरी सतह व वायुमंडल की शुद्धता से। आज हमारे भूमंडल के तत्व- धरती, जल, वायु व आकाश प्रदूषित हो चुके हैं। ऐसे में जरूरत है यह समझने की कि हमने धरती का ख्याल नहीं रखा, तो सेहत हमारी ही बिगड़ेगी। आइए संकल्प लें कि कम से कम एक पेड़ जरूर लगायें। इसके फायदे तो आप जानते ही हैं। यह आॅक्सीजन देगा, छांव देगा, हवा भी देगा। इसकी हरियाली आपका तनाव भी भगाएगी।

Friday, 29 April 2016

गरीब किसान झिनकू पेड़ पर लटक कर मर गया

कैसे कोई गरीब किसान झिनकू पेड़ पर लटक कर मर जाने में ही मुक्ति देख पाता है, इसे जानना हो तो आपको उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में आना पड़ेगा। यहां झिनकू की मौत अफसरों, नेताओं, सिस्टम से ढेर सारे सवालों का जवाब मांग रही है लेकिन सब भ्रष्टाचारी चुप्पी साधे मामले को दबाने में लगे हैं। किसान अन्नदाता होता है। झिनकू भी अन्नदाता था। लेकिन गरीबी, कर्ज और भूख ने उसे ऐसे बेबस किया कि पूरा सिस्टम उसे आत्महत्या की ओर ले जाने लगा।यूं तो अन्नदाता सबका पेट भरता है लेकिन झिनकू के पेट की फिकर किसी ने नहीं की। जिले के महोली ब्लाक के मूड़ाहूसा का किसान आखिर फांसी पर झूल ही गया और इसके साथ ही उसने तमाम सरकारी वादों को खोखला साबित कर दिया। बुधवार बीस अप्रैल को हुई किसान की मौत पर भले शासन प्रशासन मौन हो लेकिन मीडिया में लगातार खबरें आने से मामला तूल पकड़ता जा रहा है। दरअसल झिनकू की मौत यूं ही नहीं हुई। उसकी कहानी बेहद दर्द भरी दास्तान है जिसमें संघर्ष की सारी सीमाएं टूट गईं। आपको बताते चलें कि हर दिन भूख सहना और फसल पकने पर अच्छे दिनों की राह अन्य किसानों की तरह झिनकू के सपने भी ऐसे ही थे। बारह साल पहले उसकी पत्नी आखिरकार कमजोर होकर बीमार हो गई। नतीजन झिनकू ने बहुत सारा कर्जा लेकर पत्नी को बचाने का पूरा प्रयास किया। झिनकू कर्जी भी हुआ और पत्नी भी हाथ से निकल गयी। झिनकू की एक बिटिया अब शादी लायक हो चुकी थी। आखिर उसने सन 2009 में उसने अपनी बड़ी बेटी नीलम की शादी कर दी। वह पत्नी की बीमारी में लगे धन से हुए कर्जे को अब तक अदा नहीं कर पाया था। बेटी के ब्याह में उस पर तैंतीस हजार का सरकारी कर्ज भी हो गया। दिन रात भूख की फिकर छोड़कर झिनकू को कर्ज की फिकर सताने लगी। पिछले साल उत्तर प्रदेश के किसानों पर मौसम का ऐसा कहर बरसा की उनकी पूरी फसल चौपट हो गयी। लोगों ने बताया झिनकू गरीबी के चलते पटवारी को पैसे न दे पाया जिस पर उसके फसल के नुकसान की जानकारी पटवारी ने नहीं बनाई और उसे सरकारी मुवावजा भी नहीं मिल सका। वह कई बार तहसील गया अधिकारियों से गिड़गिड़ाया लेकिन उसकी शिकायत न ही दर्ज की गई और न ही उसे किसी प्रकार की सहायता दी गयी। झिनकू का एक बेटा महेंद्र शादी के बाद निशक्त हो गया। आखिर लोग उससे कर्जा लेने के लिए उसके बैल खेत में पहुँचकर रोक लेते। उसे गालियां मिलती, धमकियाँ मिलती। घर का खर्चा बहुत अधिक था। वह भूखा रहकर भी कर्ज के बोझ से दबा का दबा रह गया। अब अगर फसल का पैसा वह कर्ज अदायगी में दे भी देता तब भी भूख औरे घर के अन्य खर्चे से उसे मुक्ति मिलती नहीं दिख रही थी। आखिर झिनकू ने फांसी पर झूल कर धरतीपुत्र कहे जाने वाले मुलायम के पुत्र के राज्य में किसानों के साथ हो रहे अत्याचार की बड़ी कहानी को बयान कर डाला। अधिकारियों ने इस मामले पर मौत के बाद भी झिनकू की कोई मदद नही की। इधर मौत के पाँच दिन बाद भी स्थानीय मीडिया इसे लगातार कवर कर रही है लेकिन अधिकारी मामले के थमने की राह देख रहे हैं। झिनकू के परिवार में एक बेटी बबली (16 वर्ष) और अनुज (12 वर्ष) निशक्त बेटा महेंद्र और उसकी पत्नी है। इन सबकी जिंदगी में हल किसके कंधे पर होगा, सवाल यह भी है। एक मौत ने कई ज़िंदगियों को अंधेरे में ढकेल दिया है। झिनकू के बैल मालिक के रहते सूखा पैरा चबाने को पा जाते थे लेकिन अब उन्हें वह भी नसीब होते नहीं दिख रहा। खूँटे से बंधे बैल पाँच दिन बाद भी मालिक की राह देखते जान पड़ते हैं। वहीं झिनकू के बच्चे और परिवार के लिए गाँव के लोग अब भी सरकारी सहायता के लिए आस लगाए बैठे हैं

Wednesday, 27 April 2016

भारत में गुलाम अली को फूल, पाकिस्तान में कबीर खान को जूता

 विदेश में हुई एक घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। यह घटना पाकिस्तान के कराची में हुई है। वहां मशहूर निर्देशक कबीर खान से बदसलूकी की गई। वही कबीर खान जिन्होंने भारत-पाकिस्तान के रिश्तों को लेकर बजरंगी भाईजान जैसी फिल्म बनाई। उन्हीं कबीर खान की फिल्म फैंटम से गुस्सा कुछ लोगों ने पाकिस्तान में कराची एयरपोर्ट पर कबीर खान से बदसलूकी की। जिस वक्त ये सबकुछ हो रहा था पाकिस्तानी एयरपोर्ट पर सुरक्षाकर्मी चुपचाप तमाशा देख रहे थे। एक दिन पहले ही वाराणसी में पाकिस्तानी गजल गायक गुलाम अली ने कार्यक्रम प्रस्तुत किया। गुलाम अली के लिए हजारों दर्शकों का सम्मान आप देख सकते हैं। वाराणसी के संकट मोचन मंदिर में पेशकश दी लेकिन सरहद पार पाकिस्तान में हमारे कलाकार के साथ ऐसा सलूक किया जा रहा है। कबीर खान पाकिस्तान के कराची में एक कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने गये थे। कॉन्फ्रेंस खत्म कर जब वो भारत लौट रहे थे तभी कराची के जिन्ना एयरपोर्ट के बाहर उनके साथ पाकिस्तानियों ने इस तरह का सलूक किया। वैसे तो कबीर खान ने कई हिट फिल्में बनाई हैं। लेकिन पाकिस्तान की जमीन पर बदसलूकी का कारण बना है पिछले साल आई उनकी फिल्म फैंटम। फैंटम फिल्म में पाकिस्तान को आतंकियों का समर्थक बताया गया है। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे मुंबई हमले के गुनहगारों को पाकिस्तान ने पनाह दे रखी है और हिंदुस्तान से एक एजेंट जाकर पाकिस्तान में उसे मार डालता है। फिल्म को तब पाकिस्तान में बैन कर दिया गया था लेकिन अब इसी फिल्म के बहाने उनसे बदसलूकी हुई है। एयरपोर्ट के बाहर कबीर खान को न सिर्फ जूते दिखाए गए बल्कि पीएम नरेंद्र मोदी के बारे में टिप्पणी की गई। कबीर खान को जिन लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ा उनके शब्द थे। शर्म नहीं आती...ये जूता... ये जूता... ये जूता अफजल है, मोदी को बोलना हम आएंगे, इंडिया लाल किला पर पाकिस्तानी झंडा फहराएंगे.. पाकिस्तान जिंदाबाद..। इस पूरी घटना पर कबीर खान ने बात करते हुए कहा-ऐसे उत्पाती लोग हर जगह होते हैं। हमें इनकी हरकतों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। मैं यहां एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने आया था और मैं अपने सभी फैंस को बताना चाहता हूं कि मैं बिल्कुल सुरक्षित हूं। पाकिस्तान पर ही बनीं कबीर खान की फिल्म एक था टाइगर और बजरंगी भाई जान की कहानी को लेकर पाकिस्तान में कबीर का कोई विरोध नहीं हुआ। लेकिन पिछले साल आई फैंटम की वजह से कबीर खान को ये विरोध झेलना पड़ा। फैंटम फिल्म एस हुसैन जैदी के उपन्यास मुंबई एवेंजर्स पर आधारित है।

Thursday, 21 April 2016

जल संकट प्रकृति की चेतावनी

देश के दस राज्यों उत्पन्न जल संकट प्रकृति की चेतावनी है। अगर अब भी मानव समाज न सुधरा तो आने वाला समय भयावह होगा। शायद भविष्यवक्ताओं द्वारा कही गई बात ‘तीसरा विश्व युद्ध’ पानी के लिए होगा, सच हो जाएगा। यह संकट न केवल सरकार का है औ न ही अकेले मानव समाज का। इस संकट से निपटने के लिए मिलजुल कर प्रभावी प्रयास करना होगा। इस संकट से लड़ने के लिए मुकम्मल रणनीति अपनानी होगी। यह ध्यान रखना होगा कि गांवों में सूखे से लड़ने के लिए सामुदायिक व्यवस्था हमेशा से कारगर रही है। नाबार्ड के आर्थिक विश्लेषण और अनुसंधान विभाग ने ‘हरित क्रांति के रेन शैडो में एक सामान्य कहानी’ शीर्षक से साल 2014 में एक निबंध प्रकाशित की थी। यह निबंध गांवों में सामान्य संपत्ति (मोटे तौर पर सामुदायिक संपत्ति) अधिकारों पर सात राज्यों के 22 जिलों में 100 गांवों के 3,000 परिवारों के अध्ययन पर आधारित एक शोध पत्र है। ये गांव एरिड, सेमी-एरिड और सब-ह्यूमिड इलाकों में हैं। अध्ययन में पाया गया कि 7.30 % सीमांत, 9.60% लघु तथा 9.70% अन्य कृषक सिंचाई के सामुदायिक संसाधनों का उपयोग कर पाते हैं। भूमिहीनों के मामले में यह मात्र 0.70% है। समाज के विभिन्न वर्गों के मामले में सिंचाई के सामुदायिक संसाधनों का उपयोग करने में अनुसूचित जन-जाति 10.30%, अनुसूचित जाति 1.90%, अन्य पिछड़ी जातियां 5.60% तथा सामान्य वर्ग 8.50%। यानी विभिन्न भू-धारी तथा सामाजिक वर्ग के बीच सामुदायिक जल संसाधनों का उपयोग बराबर नहीं है। जिन गांवों में सामुदायिक संसाधनों के प्रबंध की यदि कोई व्यवस्था है, वहां अध्ययन के लिए चुने गये दस सालों में हर भू-धारी तथा सामाजिक वर्ग के लिए सिंचाई के संसाधनों की उपलब्धता तेजी से बढ़ी है। मार्च में पीएचडी चैंबर आॅफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री द्वारा आयोजित नेशनल वाटर समिट 2016 को संबोधित करते हुए सेंट्रल वाटर कमीशन के चेयरमैन जीएस झा ने कहा कि सरकार नेशनल वाटर फ्रेमवर्क लॉ तैयार करने में तत्परता से जुटी है। यह फ्रेमवर्क तैयार करते समय सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सामुदायिक सिंचाई के संसाधनों के प्रबंध की समुचित व्यवस्था हो, जिससे प्रत्येक भू-धारी तथा सामाजिक वर्ग को सामुदायिक सिंचाई के संसाधनों के उपयोग का बराबर का हक मिल सके। इस व्यवस्था में पंचायतों को केंद्रीय भूमिका दी जानी चाहिए। मॉनिटरिंग के लिए उपयुक्त बेंचमार्क भी तय किये जायें। बरसात का पानी सबके लिए एक समान बरसता है। इसलिए बरसात के पानी को सबको कंधे से कंधा मिला कर बांधना और बराबर बांटना पड़ेगा, तभी इस संकट का मुकाबला हो सकेगा।